Thursday, December 31, 2015

बालक


कबसे चुपचाप
उसकी बालसहज चेष्टायें
देख रहा हूँ.
कभी वह हंस देता हे रोते रोते
तो कभीकभी हँसते हँसते रो देता है.
कभी उसकी आँख लग जाती है बैठेबैठे
तो कभी वह उठ बैठता है नींदसे.
कभी चढ़नेके लिए बनाता है मेरी पीठको सीड़ी
तो कभी मुझे नीचे गिरानेके लिए पांवसे पाँव भीड़ा देता है.
कभी कभी नाकके बहाव पर
मस्तीसे जीभ फेरते बच्चे जैसी खुशाली झलकती है उसके निस्तेज चेहरे पर
जब वह मुझे ढेड़ पुकारता है.


शायद उसे अपनी ही विष्टामें उंगुलियाँ फेरते बच्चेसे भी ज्यादा आनद उस वक्त आता होगा.
मुझे नहीँ मालूम.
मैं इतना तो जरूर जानता हूँ 
उसको सुधारनेकी मेरी तमाम कोशिशोंके विरूद्ध वह जबरदस्त विद्रोह पुकारता है.
बस, वैसे ही
जैसे वह बालक 
अपनी चड्डी कोनेमें फैंककर  चला जाता है
घरसे बाहर
पाँव पटककर

रोषसे!

गुजराती



गाँव बीच
हाट लगाकर
बैठा बालिश गुजराती
नाम पूछता है
जात पूछता है
कोम धर्म
तिलक त्रिपुण्ड संग
एक एक अंगकी पक्की पहचान सूंघता है.
प्रभातका महिमा गाती रात चलती है
और पूरवमें सूरज उगता
अंबाजी पधारती हैं रूमझूम
अतीतके तट द्वारिका
सुवर्णमय होकर गाती.
रामराज्यका रस पिलाते
मा’त्मा पोरबन्दर पधारते है
दसों दिशाके दिकपाल
फ़ौरन ही केकारवमें कूजते है.
अहा, क्या संजोग  हुआ है!
गाँव बीच
जनेऊ डाले
बैठा बम्मन गुजराती
निरुद्देश जिसने आजतक
नेपथ्यभ्रमण किया
रसधारकी भ्रमणामें
कुछ पुराना  ही पिया
पर-धरतीका पवन पिया जिसने
एबसर्डीया लिया
टेंकत फैंकत भाषा भसता
पूरा सडा.
फिर भी निजानंदी, मस्त मिजाजी.
गुजराती हंसता है

ब्रिटीश इंडियाका बेजोड़ म्युझियम
हमने यहाँ बनाया
हल जोते थे अगरोंके
और टेंक ढकेलकर कीचडूक कीचडूक
ताराज किया था
तेलंगाना
की थी हमने सरदारी.
भारतमाताके चिथड़ा मस्तक पर
कैसी शान रचाई थी.

गाँव बीच
जात बेचकर
बैठा मक्कार गुजराती
मख्खीचूस
बड़ा कंजूस
दामके पीछे पड़ा
देस-परदेस व्यापार किया
पीता खून-पसीना
(तानता कैसे सीना!)
‘छोटा जन है सब
भद्रता नहीँ
संस्कार नहीं
शील नहीँ.
छट! तामसी, उत्पाती. ‘
कहता है कमीना महाजन
तुरंत दान और महापुण्यके
परमारथसे भीगा.
बीच गाँव
लात खा कर बैठा
बावरा गुजराती
देखा करता दिन रात
जैसे जनमसे है काना
मुरलीवाला या बकरीवाला
मोहनको पकड़कर ले  आना
धरमके माथे विपदा पडी है
अब रहूँगा न में सयाना
गुजरातीकी बात करू
पर जात बिरादरी है अव्वल.

बीच गाँव
जात पूछकर
बैठा नाचीज़ गुजराती
भरतार मरा है उसका
फिर भी भाषा हमारी
संस्कृतसे जो आयी  
वानरसे ही पुच्छ बीना
मनुष्य है आया
पीछे हटना
मुश्किल है अब
फिर भी
धरम करम और भाषा भरम के
ताने यहाँ बुनते जाते
बीच गाँव
गांड बगैरका
लोटा एक
दड दड ...
       दड दड ...

               ददडता...

नवनिर्माणके युवा शहीदोंने नाम















आप भी कभी
यहाँ आश्रम रोड पर
सिनेमाकी लाईनमें  हाथमें डायरी लिए खड़े थे .
अभी नदीके तटपर गैरकानूनी फाइव स्टार होटल बना न था.
अलबत्ता, मानेक चौकमें साड़ीकी दूकान पर बैठे
सेठकी तोंद जैसी 
झोपड़पट्टी विस्तीर्ण हो रही थी.
उतनेमें रास्ते पर ट्राफिककी आवाजसे भी तेज    
भ्रष्टाचारकी आवाज गूँज उठी. 
आत्माकी आवाज वजनी थैलीओंके तले कुचल गयी. 

आप शासनके ब्लेक आउटके विरूद्ध क्रान्तिकी मशाल बन कर आये.

मैं तेरी ही राह देख रही हूँ



https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjjQESq0TWPDmNPXcfHm2J-DvIVQvU1xl2i8F3B2wdu7aLzc4gPSkoFowOb44o_JeBcGKQhx-z5vp-N-hbE23jW7O4c_3UsJfaET52Ys3Zh9vgRSf2gHBkEXTBCB-9Qok4oEQxfjZHOxZ3n/s320/mask-village-woman-from-india-PT30_l.jpg




मैं तेरी ही राह देख रही हूँ.
मेरी उपेक्षा मत करना
मुक्तिके प्रभातकी एकाध किरन मुझे भी देना. 
मानव सभ्यता फूली
पुनीत सरिता तट पर
तबसे मैं तेरी राह देखती हूँ
जैसे देखती थी
शिकारको गये मेरे साथीकी
फेरते धीरेसे कंगी
धरतीके मृदु मस्तक पर.
कृषिकर्मकी जन्मदात्री मैं,
स्वयं धरित्री.
धरा एकपतिव्रत
फिर भी करना पड़ा अग्निप्रवेश 
पांच पतिकी संगिनी
हिमालयमें देह गला .
मैं शूद्रातिशूद्र 
पापयोनि
गीताकार या भाष्यकार
सब जगह मैं नरककी  खान
क्वचित हुयी गार्गी या कभी मैत्रेयी 
अहल्या हुयी हमेशा
खायी पुरुषकी ठोकर.
मैं तन्त्र विज्ञानकी माया 
गान्धर्वलोककी अप्सरा
इन्द्रसभाका मनोरंजन
वत्स्यायनकी कामक्रीड़ाके लिए
हुआ मेरा सृजन.  
बंधु, दास होकर तुमने
सेवा की आर्यस्वामीकी/
तुम्हारे समीप मैं ही थी
अनौरस संतानोंकी माता
शूद्र, क्षुद्र , तुच्छ माता.
आज तेरे मेरे संतानोंकी निकली है
विजययात्रा  एक नया विश्व रचनेके लिए
विश्व समानताका
स्त्री-पुरूष भेद बगैरका.
मैं खड़ी हूँ कोनेमें
घरकी चार दीवारोंमें.   .
आ, पकड़ मेरा हाथ
मुझे भी भुगतने दे

मुक्तिकी प्रसववेदना.  

खोज





इसीलिए तो हम कहते हैं भाई
ये ढेड़ कभी मानेंगे नहीं
उन्हें तो करना पड़ेगा सीधा
वे तो मुलकके  चोर.
देखो कैसी महान, शीलवंती है संस्कृति हमारी 
जहां जीवनके नाजुक सवाल सुलझते है
नियोग जैसी प्रथासे.
सुन्दर,मनोहर भारतवर्ष सयाने साधू संतोंका
जहां गोवर भी पवित्र 
नाग,साँप,गाय,बैल,भेड़,बकरे ..
हम तो सबका पूजन करते हैं प्रेमसे 
उसमें यह नूगरे- नालायक
पूर्व जनमके पापी
कुत्ते,बिल्ली,घोड़े,गधेसे भी गिरे
नीच वर्णके लोग
हमारी कंचन जैसी कयाको अपवित्र करें
हमरी बचीखुची आचार शुद्धिको ठेवे चादावे
उन्हें कोई न रोके, न टोके 
और उपरसे काला कायदा उन्हें ढेड़ कहनेसे हमें रोके 
कैसा सरासर अन्याय.
वाणी स्वातंत्र्यके  नाम पर
इस बिगड़ी हुई वर्णसंकरने
कैसा कलजुग आया रे!
हम तो रहे भले-भोले-भावनाशील 
नहाना क्या, निचोना क्या?
बहुत हो जाय तो कर देते हैं दरवाजा बंद
या अखबारके चीथड़ेमें मीठे गुड़में विष घोलते है,
हो सके तो કોથળામાં પાંચશેરી મારીએ
और वह भी तो ठीक है न कि
आगे हो पहचानी अटक ,और पीछे बापका नाम   
(गर बहुत विचारवायु होता है तो देखते हैं
ब्लड ग्रुप तमाम 
या दरपनमें थोबड़ा लटका कर  देख लेते हैं:
क्या क्या विरोधी , क्या क्या समान ?)
उससे विशेष होता है हमें कुछ ज्ञान ?

है न सुखभरा सज्जनों, हमारा अज्ञान ?